क्या आप चेतन भगत के बात से सहमत हैं?

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  • सुनील वाणी
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  • (सुनील)
    प्रसिध्द लेखक चेतन भगत के 26 अगस्त, दैनिक भास्कर में कॉमनवेल्थ गेम्स पर छपी उस लेख जिसमें उन्होंने देश की जनता से इस खेल का बहिष्कार और स्टेडियम में न जाने की अपील की है, क्या उचित है और क्या आप उनके इस बात से सहमत है। स्तंभ में छपी कुछ बातें -
    'यदि हम इस आयोजन का समर्थन करते हैं तो यह हमारी गलती होगी। यह भारत के नागरिकों के लिए एक सुनहरा मौका है कि वे इस भ्रष्ट और संवेदनहीन सरकार को शर्मिंदगी का एहसास कराए। आमतौर पर भ्रष्टाचार के मामले स्थानीय होते हैं और वे पूरे देश का ध्यान नहीं खींचते लेकिन राष्ट्रमंडल खेलों के मामले में ऐसा नहीं है। यह एक ऐसा आयोजन है जिसमें किसी एक क्षेत्र या प्रदेश विशेष की जनता नहीं बल्कि पूरे देश की जनता ठगी गई है। यह सही समय है जब हम भ्रष्टाचार के खेल का पर्दाफाश कर सकते हैं और इसके लिए हमें वही रास्ता अख्तियार करना होगा, जो हमें बापू ने सुझाया है - असहयोग। मैं काफी सोच-समझकर ऐसा कह रहा हूं। राष्ट्रमंडल खेलों का बहिष्कार करें। न तो खेल देखने स्टेडियम में जाएं और न ही टीवी पर देखें। हम धोखाधडी के खेल में चीयरलीडर की भूमिका नहीं निभा सकते। भारतीयों का पहले भी काफी शोषण किया जा चुका है। अब हमसे यह उम्मीद करना और भी ज्यादती होगी कि इस खेल में मुस्कुराते हुए मदद भी करें। यदि वे संसद से वॉकआउट कर सकते हैं तो हम भी स्टेडियमों से वॉकआउट कर सकते हैं।'
          ये सच है कि गेम्स से जुडे अधिकारियों और नेताओं ने भ्रष्टाचार की नई मिसाल खडी करते हुए भारत की प्रतिष्ठा को ताक पर रख दिया है। उन्होंने तो आदतन वैसा ही किया जैसा उनसे उम्मीद की जाती है। यदि ऐसे में देश की जनता भी स्टेडियमों में जाने से इंकार कर दे तो विश्वस्तर पर हमारी क्या इज्जत रह जाएगी। ये वक्त देश में होने वाले कॉमनवेल्थ गेम्स के बहिष्कार का नहीं बल्कि हमारी प्राथमिकता इसके सफल आयोजन पर होनी चाहिए। हमें यह याद रखना होगा कि ये कोई घरेलू आयोजन नहीं है, पूरे विश्व की इस पर नजर है। ऐसे में देश की जनता का सहयोग नितांत जरूरी है। जरा सोचिए कि देश में होने वाले गेम्स में यदि भारतीय दर्शक नजर नहीं आएंगे तो विश्व में हमारी क्या छवि रह जाएगी। इस गेम में देश का हजारों करोड रुपया फंसा हुआ है और यदि भारतीय दर्शक स्टेडियम नहीं पहुंचते हैं तो भारतीय अर्थव्यवस्था भी प्रभावित हो सकती है। जहां तक बात है बापू के असहयोग आंदोलन का तो वह विदेशी दुश्मनों को देश से बाहर खदेडने के लिए था लेकिन यहां तो देश का दुश्मन अपने ही लोग हैं। इनसे निपटने के लिए नेताओं का असहयोग करना होगा न कि खेलों का।

    12 टिप्‍पणियां:

    1. ji haa,yeh sarasar satya hai kui ki aaj kal. bina diye ek file moov hona musakil hai.ye to bada game ke sath money ka fame hai.

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    2. janta ko nahi bharati khiladio ko khel ka bhasikar karna chaihya.

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    3. यहाँ सबके अपने अपने विचार हो सकते हैं, घर की बात घर में ही रहनी चाहिए उसे सार्वजनिक बना कर हम वाहवाही नहीं लूट सकते बल्कि पूरे विश्व के सामने खुद को ही शर्मसार करने वाली आ सामने आती है. बहिष्कार तो उन लोगों का करना चाहिए जो इसमें सम्मिलित हैं, इस खेलों में हमारा ही रूपया लगा है फिर हम उससे इंकार क्यों कर रहे है? खेल अब होने दीजिये ये भारत कि प्रतिष्ठा का प्रश्न है इन रिश्वतखोरों कि तो कोई प्रतिष्ठा या जमीर है ही नहीं. खेलों का बहिष्कार गलत है. ये पहला अवसर नहीं है, हजारों बार ऐसा ही होता रहा है तब हम क्यों नहीं सजग होते हैं? अगर इतनी जागरूकता आम इंसां में आ जाये तो ये सत्ता गलत हाथों में जाए ही क्यों?
      इसके स्वरूप को बदल कर विरोध के और भी अवसर हैं उन पर प्रयोग कीजिये.

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    4. न केवल खेल का बहिष्कार करना चाहिए, बल्कि कोई ऐस रास्ता बनाना चाहिए, कि लोग जाकर सरकार के मुंहपर थूक सकें। यह भ्रष्टाचार नहीं है, देश की इज्जत की पूरे विश्व के सामने नथ उतारी गई है। यह सर्वाधिक शर्मनाक वाकया है, इनके जिम्मेदारों को गोली मार देनी चाहिए। अगर ऐसा नहीं हुआ, तो निचले स्तर पर भ्रष्टाचार के प्रेरणास्तंभ खड़े हो जाएंगे, बड़ेस्तरों पर आए दिन घोटाले होंगे। एक मकबूल फिदा हुसैन ने भारत मां की नंगी तस्वीर बनाई थी, तो सबका खून खौला था। यह दूसरी तस्वीर है, जो कामनवेल्थ घोटाले के रूप में गढ़ी गई है। सब लोग इसका बहिष्कार करें, देश की छवि खराब होने की चिंता न करें। विश्वभर को पता चले कि इस गरीब देश में घोटाले भले होते हों, परंतु यहां के लोग इसे बर्दाश्त नहीं करते। यहां हर कोई भ्रष्ट नहीं है। ।

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    5. खेल हों या कोई और समस्या बिना घोटाले यदि कुछ हो पाता
      तभी देश तरक्की कर पाता |अच्छा लिखा है |बधाई
      आशा

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    6. खेल का बहिष्कार करना चाहिए, मै इस बत से सहमत हुं, क्योकि अब बात गह्र की नही अगर जनता अब भी चुप रही तो यह घर भी कभी बिक जायेगा, दुनिया मै सभी जानते है हमारे इस घर की बात.
      आप का धन्यवाद

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    7. घर के झगड़े चौराहों पर नहीं सुलझाए जाते.

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    8. जी अपना तो सोचना है की हमें इन खेलों का बहिष्कार करना चाहिए. ये घर का झगडा बाहर ले जाने का मामला नहीं है बल्कि सारे विश्व को ये समझाने का वक्त है की भारत की आम जनता इस भ्रष्टाचार के खेल से भर चुकी है और इन देशद्रोहियों को हर कीमत पर सबक सिखाना चाहती है. चेतन भगत तुम्हारी जय हो.

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    9. सब के अपने-अपने विचार हैं, हालांकि हैरत होती है कि चेतन भगत जैसा बड़ा और कामयाब लेखक ऐसा कह रहा है। ठीक है कि इन गेम्स में भ्रश्टाचार की नई इबारतें लिखी गईं हैं लेकिन क्या ये इबारतें विदेशी खिलाड़ियों ने लिखी हैं? क्या ये इबारतें हमारे मुल्क के खिलाड़ियों ने लिखी हैं? नहीं तो फिर उनका बहिश्कार क्यों? क्या हमारे समाज में इतनी हिम्मत बची है कि वो अपने घर-परिवार या रिष्तेदारी में भ्रष्टाचार के जरिये धनकुबेर बनने वालों से सम्बन्ध तोड़ सके? क्या इतनी हिम्मत है कि भ्रष्ट अफसर का विरोध कर सके? क्या इतनी हिम्मत है कि आने वाले चुनाव में भ्रष्ट और अपराधी छवि वाले व्यक्ति को वोट न दे? मुझे नहीं लगता कि अधिसंख्य में इतनी हिम्मत है क्योंकि इतनी हिम्मत अगर होती तो ये दिन ही न देखना पड़ता। कुछ लोगों ने तो मुल्क की नाक कटवा दी अब बची खुची बहिष्कार करने वाले कटवा दें। अगर सोच का पैमाना ऐसा ही हो गया है तो जरूर बहिष्कार के अभियान को आगे बढ़ाइये।

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    10. जो गोट सीधी खेली जानी चाहिए, उसे भी कैरम के रिबाउन्‍ड ही नहीं बल्कि बिलियर्ड्स और स्‍नूकर की तरह खेलना, सभ्‍यता का तौर-तरीका बन रहा है. समस्‍या और परिस्थिति के लिए लक्ष्‍य से सीधे जूझना ही श्रेयस्‍कर होगा.

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