यदि महिलाएं डायन हैं तो पुरुष कुछ क्यों नहीं?

Posted on
  • by
  • संजीव शर्मा
  • in
  • पिछले दिनों तमाम अख़बारों में एक दिल दहलाने देने वाली खबर पढ़ने को मिली.इसमें लिखा गया था कि देश में अभी भी महिलाओं को डायन बताकर मारा जा रहा है.दादी-नानी से सुनी कहानियों के मुताबिक डायन वह महिला होती है जो दूसरों के ही नहीं बल्कि अपने बच्चे तक खा जाती है.इन कहानियों के आधार पर बचपन में मेरे मन में डायन कि कुछ ऐसी डरावनी छवि बन गयी थी जैसी कि अंग्रेजी फिल्मों में ड्राकुला की होती है.मसलन लंबे भयानक दांत.कुरूप चेहरा,गंदे व खून से लथपथ नाखून इत्यादि वाली महिला! परन्तु जब भी डायन बताकर मारी गयी महिला की तस्वीर देखता तो वो इस छवि से मेल नहीं खाती थी.कभी दादी-नानी से पूछा तो वे भी संतुष्टिपूर्ण जवाब नहीं दे पायीं.वक्त के साथ समझ आने पर डायन कथाओं और इनके पीछे की हकीकत समझ में आने लगी.
    ऊपर मैंने जिस खबर का उल्लेख किया है उसमें एक गैर सरकारी संस्था रूरल लिटिगेशन एंड एनटाइटिलमेंट केंद्र द्वारा किये गए अध्ययन के अनुसार बताया गया था कि देश में हर साल 150-200 महिलाओं को डायन बताकर मार डाला जाता है। इस संस्था ने राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो के आंकडों के हवाले से बताया कि इस सूची में झारखंड का स्थान सबसे ऊपर है। वहां 50 से 60 महिलाओं की डायन कहकर हत्या कर दी जाती है। दूसरे नंबर पर पर आंध्रप्रदेश है, जहां करीब 30 महिलाओं की डायन के नाम पर बलि चढ़ा दी जाती है। इसके बाद हरियाणा और उड़ीसा का नंबर आता है। इन दोनों राज्य में भी प्रत्येक वर्ष क्रमश: 25-30 और 24-28 महिलाओं की हत्या कर दी जाती है। इस संगठन के मुताबिक पिछले 15 वर्षों में देश में डायन के नाम पर लगभग 2,500 महिलाओं की हत्या की जा चुकी है।
    सवाल यह उठता है कि यदि आज के आधुनिक और तकनीकी संपन्न दौर में भी जब महिला डायन हो सकती है तो पुरुष कुछ क्यों नहीं होता.अब इसे पुरुष सत्तात्मक समाज की विडंबना कहें या पुरुषवादी सोच कि उन्होंने शब्दकोष में डायन के पर्यायवाची शब्द की गुन्जाइश ही नहीं रखी.दरअसल गांवों में फैली अज्ञानता और शिक्षा की कमी के कारण इस तरह की कुप्रथाएं आज भी शान से कायम है. वैसे जानकर डायन बनाने का कारण ज़मीन के झगड़े,महिलाओं के साथ जबरदस्ती करने में मिली नाकामयाबी,पारिवारिक शत्रुता,विधवा हो जाने को भी मानते हैं.खास बात यह है कि डायन सदैव दलित या शोषित समुदाय की ही होती है.ऊंचे तबके की महिलाओं के डायन होने की बात यदा-कदा ही सुनने में आती हैं.इससे भी आश्चर्य की बात यह है कि “ओनर किलिंग” के नाम पर देश को सर पर उठा लेने वाले मीडिया,नेता,समाजसेवी और बड़े गैर सरकारी संगठन डायन के मुद्दे को ज्यादा महत्त्व नहीं दे रहे जबकि यह वास्तव में मानव सभ्यता पर कलंक है और स्त्री जाति का अपमान है.जिस देश में महिलाओं को दुर्गा,काली ,लक्ष्मी,सरस्वती,गंगा,माँ जैसे पवित्र नामों से पूजा जाता है वहीँ उसे डायन बताकर मार भी डाला जाता है?हम कब तक इसीतरह मौन रहकर माँ को डायन बनता देखते रहेगें?कम से कम इसके खिलाफ आवाज़ तो उठा ही सकते हैं..?

    5 टिप्‍पणियां:

    1. hi dear, u have a nice blog..
      pls check mine too n share ur thoughts with me.......
      thanx

      keep bloging..

      उत्तर देंहटाएं
    2. hmmmm aadmi dayan nahin chandaal hote hain, jo achi khasi ourat ko apne fayde k liye dayan sabit kar dete hain

      उत्तर देंहटाएं
    3. संजीव जी, सबसे पहले तो बधाई और आभार जो आपने यह मुद्दा उठाया और इतनी जानकारी सब के सामने रखी जो मन को झकझोरने वाली है। महिलाओं के साथ होने वाले अत्याचारों में की कड़ी में यह डायन बनाने का ड्रामा भी शामिल है। जिसके पीछे वजह पूरी तरह व्यक्तिगत होती है। कभी जमीन हङपना तो पारिवारिक दुश्मनी। यानि की सब सोची समझी चाल।

      उत्तर देंहटाएं
    4. डायन बता कर महिलाओ को मारना कोई बहुत बड़ी सामाजिक समस्या नहीं है जिसको ख़त्म करना संम्भव न हो यह एक व्यक्तिगत लडाई का नतीजा है जैसा कि आप ने कहा | यह सीधा साधा कानून व्यवस्था का मामला है जिसे पुलिस अपनी क़ानूनी कार्यवाही कर के रोक सकती है पर वो ऐसा नहीं कर रही है जो इस तरह कि घटनाओ को बढ़ावा देती है| ऐसे मामलो में किसी एक दिन उन्हें डायन कह कर नहीं मारा जाता इसकी शुरुआत पहले कुछ घटनाओ से हो जाती है पर पीड़ित पक्ष समाज का सबसे कुचला वर्ग होता है इसलिए या तो वो डर से पुलिस के पास नहीं जाता है या जाता भी है तो उस पर कार्यवाही नहीं होती |

      उत्तर देंहटाएं

    आपके आने के लिए धन्यवाद
    लिखें सदा बेबाकी से है फरियाद

     
    Copyright (c) 2009-2012. नुक्कड़ All Rights Reserved | Managed by: Shah Nawaz