गाँव से आगे, गाँव के पीछे

Posted on
  • by
  • Dr. Subhash Rai
  • in
  • Labels:
  • गाँव से आगे, गाँव के  पीछे


    गाँव खतरे में हैं. शहर धीरे-धीरे उन्हें निगल रहे  हैं. शहरों में अंग्रेजी है, बड़े बाज़ार हैं, खूब पैसा है. लोग वैभव भरी जिंदगी में मस्त हैं. कुछ भी खरीद सकते हैं. अच्छे से अच्छा फोन, बड़ी से बड़ी गाड़ी, खूबसूरत कपडे. मजदूर भी. शहर में केवल वैभव ही है, ऐसा नहीं. उसके भी दो चेहरे हैं. गरीब, मजदूर भी है और उसकी मेहनत को खरीदने वाला अमीर भी है. मजदूर की मजबूरी है, वह मामूली कीमत लेकर दिन-रात पसीना बहाता है और उसी का पसीना सम्पन्न लोगों की तिजोरी में सोना बनकर जमा होता है.

    शहर बहुत ही कठोर है, निर्मम है, उद्धत है.वह पश्चिम के असर में है, वह अपने रंग में सबको रंगना चाहता है. जो राजी-ख़ुशी तैयार हों , उसके साथ नाचे, गाएं , सुख सुविधा पर पैसा लुटाएं  और यह न कर पायें  तो उसके उत्सव में दरी-गलीचा बिछाएं , झाड़ू लगायें , पसीना बहाकर उसका आनंद बढ़ाएं . जो शहर के इस नए संस्कार  का विरोध करता है, शहर या तो उसे  खरीदकर कचरे में डाल देता है या समूचा निगल जाता है. गाँव ललचाया हुआ भी है और संकोच में भी है. वह इस नए वैभव का मजा भी उठाना चाहता है और अपनी धोती भी नहीं उतारना चाहता. यह दुविधा बहुत प्रतिरोध करने की हालत में नहीं है, क्योंकि शहर में पढ़ रहे गाँव के बच्चों को धोती-कुरता बिल्कुल पसंद नहीं, वे रोटी-डाल की जगह पिज्जा में ज्यादा दिलचस्पी लेने लगे हैं. इन्हीं की बांह पकड़कर शहर गाँव में घुस आया है. गाँव के समर्पण में अब ज्यादा देर नहीं दिखती.


    मैं बहुत दिनों बाद गाँव गया. मैंने बस ड्राइवर  से कहा कि मुझे बड़ा गाँव उतार देना. उसने ऐसा ही किया, पर शायद उसे पता नहीं था कि वह जहाँ मुझे उतार रहा है, वह गाँव से एक किलोमीटर आगे कोई जगह है. मैं अपने गाँव को एक ऐसी जगह पर खड़ा होकर ढूंढ़ रहा था, जहाँ मेरी पहचान की कोई चीज नहीं थी. गलत फैसला किया और गाँव से दूर बढ़ गया. कुछ चलने के बाद भी गाँव नहीं आया तो मैंने चारों ओर आकाश के तट पर कोई पहचान तलाशनी शुरू की. थोड़ी देर बाद मेरे उजड़ गये बाग के कुछ पेड़ नजर आये,गाँव के बाहर जा  बसे यादव परिवार का घर दिखा.आश्चर्य मैं अपने गाँव  को ही नहीं पहचान पाया और दो किलोमीटर आगे चला गया. झिझकते-झिझकते वापस लौटा.

    शहर से कम नहीं है मेरा गाँव. बड़ी-बड़ी कोठियां, कारें, टी वी, फ्रिज, बिजली  सब कुछ है. वहां भी लोग सुबह  मैदान नहीं जाते. हर घर में ताइलेट  है, बाथरूम है. कुछ बच्चे  पढने बाहर गये तो वे बाहरी ही हो गये. उनके घर वाले खुश हैं कि वे डालर कमाते हैं. कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे शौच के बाद अब पानी का नहीं कगज का इस्तेमाल करते हैं. गाँव बिकने को तैयार है, वह उनकी प्रतीक्षा में है, जो ज्यादा से ज्यादा बोली लगायें. वह  अपनी बोली, अपना संस्कार, अपनी  करुणा सब कुछ छोड़कर पैसा बटोरना चाहता है. असल में मैं अपने एक साहित्यकार मित्र के न्योते पर गया था. अभिनव कदम के संपादक जय प्रकाश धूमकेतु के बेटे ने शादी कर ली, इस ख़ुशी में उन्होंने रिसेप्सन दिया था. वे वामपंथी विचारों के हैं, फिर भी वहाँ काफी चमक-दमक थी. खाने -पीने का बेहतरीन  इंतजाम था.

    वहां जाना अच्छा रहा. इसी एक शाम के लिए मैंने तीन दिन बर्बाद किया. वहां मेरे तमाम पुराने दोस्त मिले, प्रशंसक मिले. लेखकों, कवियों से मुलाकातें हुईं. कुछ ऐसे लोग भी मिले, जो जानते तो थे मगर पहचानते नहीं थे. खाना, गपियाना, मुस्कराना , इससे ज्यादा कुछ तो नहीं हुआ, पर इतना भी क्या कम था. आजकल जिस तरह आदमी की हंसी खोती जा रही है, उसमें बनावटी हंसी भी कम फायदेमंद नहीं है. राम निवास मेरा छात्र जीवन का दोस्त है. बहुत ही मजाहिया  लहजा है उसका. मेरी एक फोटो है उसके पास, कहता है बिल्कुल ड्रेकुला  जैसा दिखता हूँ . यह कहकर इतनी जोर का ठहाका लगाता है कि मुझे मेरे दांत सचमुच बाहर निकले महसूस होने लगते हैं. उसने डा अनिल कुमार राय से परिचित कराया, हालाँकि हम दोनों एक दूसरे को पहले से ही जानते थे, बस पहचानते नहीं थे. वे हिंदी के स्थापित लेखकों में शुमार किये जाते हैं. मेरे गुरुओं हिंदी के बड़े समीक्षक डा कन्हैया सिंह और संत साहित्य के विद्वान  डा चन्द्र देव राय का वहां  होना मेरे लिए एक अभूतपूर्व अवसर था.
    मेरे बड़े भाई, साहित्यकार  और वर्धा हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति  डा वी एन राय , डा अनिल कुमार अंकित, सुपरिचित गीतकार डा कमलेश राय, समीक्षक राम निवास कुशवाहा और अन्य अनेक रचनाधर्मियों का मिलना बहुत आनंदवर्धक रहा.


    मैं भी वहां जाकर गाँव को भूल गया, गाँव के संकट को भूल गया. यह एक शाम मेरे भीतर इतनी उर्जा भर गयी कि मैं अब कई महीने अपनी गाड़ी बिना ठेले ही दौडाता रहूँगा.इसका श्रेय धूमकेतु जी को दूं या उन बच्चों को जिन्होंने हमें शादी के धूम-धड़ाके में शामिल होने से वंचित कर दिया और इस तरह चुनौती खड़ी कर दी कि रिसेप्सन शादी से  भी बढ़िया होना चाहिए. और वह हुआ भी.दर असल धूमकेतुजी  के बेटे ने प्रेम विवाह  कर लिया था. हम सब खुश थे और यह बताने में सफल रहे कि हम उसकी पीढ़ी से पीछे नहीं हैं, हमें उनका प्रेम स्वीकार है.     

    1 टिप्पणी:

    आपके आने के लिए धन्यवाद
    लिखें सदा बेबाकी से है फरियाद

     
    Copyright (c) 2009-2012. नुक्कड़ All Rights Reserved | Managed by: Shah Nawaz