बंदूकों की नाल से सत्ता नहीं निकलेगी

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  • Dr. Subhash Rai
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    फिर एक बार नक्सलियों ने सत्ता को चुनौती दी है। मुंबई जा रही ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस के ट्रैक पर धमाका करके 65 लोगों की जान ले ली है। नक्सलियों के समर्थक बुद्धिजीवी उनका पक्ष लेते हुए कहते हैं कि समस्या के मूल में जाना होगा, समझना होगा कि वे आखिर बंदूक उठाने को मजबूर क्यों हुए। क्या वे बता सकते हैं कि इन हत्याओं से आदिवासियों की, गरीबों की समस्याएं हल हो जायेंगी? क्या इस तरह नक्सली बहुसंख्य देशवासियों की सहानुभूति खो नहीं रहे हैं? यह सर्वहारा के कल्याण का दर्शन है या निरा पागलपन?

    मार्क्सवाद अपने सैद्धांतिक चेहरे में पूरी तरह मानवीय दिखता है क्योंकि वह शक्तिसंपन्न वर्ग के हाथों शोषण के शिकार लोगों के हक की बात करता है, वह तमाम असुविधाओं में जिंदगी बसर करने वाले मजदूरों, किसानों, दलितों और गरीबों की बात करता है। यह सही है कि मौजूदा व्यवस्था गरीब को और गरीब तथा अमीर को और अमीर बनाने का औजार बन गयी है लेकिन केवल इसलिए किसी को निर्दोषों की हत्या की आजादी नहीं मिल सकती।

    माओ ने कहा था कि सत्ता बंदूक की नाल से निकलती है और माओवादी नक्सली जानते हैं कि माओ का प्रयोग अभी असफल नहीं हुआ है, इसलिए उन्हें पूरा भरोसा है कि वे बंदूक और बारूद की ताकत से एक न एक दिन हिंदुस्तान की सत्ता पर कब्जा कर लेंगे। वे शायद इस बात पर नहीं सोचते कि दार्शनिक माओ और शासक माओ में कितना अंतर था? क्या चीन में क्रांति के बाद सत्ता सर्वहारा के हाथ में आयी? क्या वहां सचमुच सामाजिक बराबरी आ पायी? सच तो यह है कि जब तक क्रांति नहीं होती है तब तक तो सर्वहारा के शासन की बात की जाती है, गरीबों के अधिकार की बात की जाती है लेकिन एक बार सत्ता हाथ में आते ही सारे अधिकार मुट्ठी भर लोगों के हाथ में सिमट जाते हैं, विरोध और असहमति की आजादी छीन ली जाती है, किसी एक प्रभुतासंपन्न तानाशाह या समूह की तानाशाही के हाथ में मनमानी ताकत आ जाती है। सर्वहारा मुंह ताकता रह जाता है।

    हिंदुस्तान के नक्सलियों को यह भी नहीं दिखायी पड़ता कि चीन ने किस चालाकी के साथ संभावित उथल-पुथल से बचने के लिए अपनी सत्ता की गाड़ी पूंजीवादी समाजवाद के रास्ते पर मोड़ दी। चीन की समृद्धि देखकर यह अंदाज नहीं लगाना चाहिए कि वहां के सत्तानायकों में उदारता आ गयी है, वे अपने किसी भी विरोधी के प्रति न सिर्फ परम अनुदार हैं, बल्कि निर्मम और क्रूर भी हैं। तिब्बत में क्या किया उन्होंने? अपने ही राज्य शिनजियांग में क्या किया उन्होंने? क्या सत्ता में आकर किसान या सर्वहारा इतना कसाई हो सकता है?

    छिपकर लोगों पर हमला करना और उन्हें मार देना, इसमें कौन सा शौर्य है। यह पागल, अंधी और बेवजह हत्याएं क्या नक्सलियों के लिए सत्ता के द्वार खोल देंगी? इस समस्या को इतना बिकराल बनाने में सरकारों की उदासीनता जितनी जिम्मेदार रही है, उतनी ही जिम्मेदार देश में एक खास किस्म के बुद्धिजीवियों द्वारा नक्सलियों को दिया जा रहा समर्थन भी है। क्रांति ऐसे तथाकथित बुद्धिजीवियों के लिए एक फैशन बन गयी है। गरीबों के हित की बात करना कोई गुनाह नहीं है, उनके हको-हुकूक के लिए लड़ना भी कोई अपराध नहीं है लेकिन क्या केवल इस नाते कि सरकारों ने गरीबों के लिए अपेक्षा के अनुरूप काम नहीं किया, निर्दोष और निरपराध नागरिकों तथा अदने सरकारी मुलाजिमों की हत्या करने का उन्हेंं अधिकार दिया जा सकता है? वे यह नहीं सोचते कि यह स्वतंत्रता उन्हें नक्सलवादियों के डर से नहीं दी गयी है बल्कि यह लोकतंत्र के बीजमंत्र की तरह उन्हें अपने आप मिली हुई है। वे यह भी जरूर जानते होंगे कि सर्वहारा के शासन में इस तरह की छूट नहीं मिलती।

    बेहतर यही होगा कि पहले जनपक्षधरता के छद्म की आड़ में जनाकांक्षाविरोधी संग्राम में जुटे लोगों से बातचीत करने की पूरी कोशिश की जाय। जरूरत हो तो इस काम में उनके समर्थक दार्शनिक बुद्धिजीवियों को भी लगाया जाय। फिर भी बात न बने तो उन्हें खदेड़ दिया जाये, वे लड़ते हैं तो उन्हें नष्ट करने में भी कोई संकोच नहीं होना चाहिए। इसी में गरीबों का, आदिवासियों का, जनता का, सरकार का और देश का, सबका भला है। परंतु भविष्य में वे गलतियां जरूर सुधार ली जायं, जिनकी वजह से नक्सलियों को देश के हृदयभाग में इतनी दूर तक अपने पांव पसारने का मौका मिला था।

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