बदलते वक्‍त की जरूरत (रश्मि रविजा)

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  • अविनाश वाचस्पति
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  • बदलते वक्‍त की जरूरत

    पहले कतरन पर क्लिक करके पूरा पढियेगा तभी अपनी राय दीजिएगा।
    यह पोस्‍ट दिनांक 27 जनवरी 2009 के राष्‍्ट्रीय सहारा दैनिक, नई दिल्‍ली के सहारा इंडिया मास कम्‍यूनिकेशन द्वारा प्रकाशित साप्‍ताहिक पत्रिका आधी दुनिया में पेज नंबर 7 पर सचित्र प्रकाशित हुई है। आप इसे पढि़ये और एक बार फिर सच्‍चाईयों की गहराईयों में उतर जाइये।

    15 टिप्‍पणियां:

    1. अविनाश भाई इस कतरन को मै कल से ढूढ रहा था.

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    2. मुझे भी नहीं मिला ये वाला पेपर ।

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    3. बहुत सुंदर, लेकिन यह् हम ने थोडे दिन पहले भी कही पढी थी

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    4. बिलकुल ठीक कहा आपने लेकिन यह भारतीय समाज इसे मुश्किल से स्वीकार कर पाता है, इसलिए हर भारतीय को नारी के प्रति अपनी सोच में परिवर्तन लाना होगा! बेहतरीन !

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    5. इस बात में काफी दम है हमे वही करना और पहनना चाहिए जिसमे हमे मज़ा और सहजता हो

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    6. रश्मि जी ,बात तो बिलकुल सही है ,
      समय ,समाज,परिवेश के अनुकूल ही व्यक्तियों की सोच होनी चाहिए ,
      अब आज -कल कोई ४०० वर्ष पहले जैसा आचरण की अपेक्षा करने लगे ,
      फिर तो बन गया हमारा भारत महान ,
      आज भी वैसे लोगों की संख्या कम नहीं है जो सौम्य आधुनिकता को बुरा नहीं मानते ,
      धीरे-२ लोगों की सोच में परिवर्तन होगा ही , जब स्वयं का ह्रदय साफ़ होने लगेगा -
      तो औरतों के परिधान पर टिप्पणियाँ ही बंद हो जाये शायद !
      बदलते समय में दुल्हन और गुडिया जैसे कपडे किसी भी कार्य करने में सहायक सिद्ध
      नहीं हो सकते ,इसलिए मै आवश्यकतानुसार आरामदायक पोशाक अपनाने से सहमत हूँ

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    7. Rashmi ki baat se 100% sahmat hun...
      bahut badhiya..
      rashmi ko badhaai..

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    8. एकदम दुरुस्त फ़रमाया दीदी
      जय हिंद...

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    9. bahut sarthak lekh likha hai....waqt ke saath badalna hi chahiye.....rashmi ji ko badhayi achchhe lekhan ke liye...

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    10. अविनाश जी! कतरन ने चिंतन के द्वार खोले.....मनुष्य वस्त्रों का प्रयोग प्रमुख तीन कारणों से हजारों वर्षों से करता आया है-(1) मौसम की मार से शरीर की रक्षा के लिए (2) शारीरिक लज्जा को ढ़कने के लिए तथा (3) दूसरों के बीच आकर्षक दिखने के लिए। इसके अतिरिक्त आधुनिक युग में वस्त्र-प्रयोग एक कारण और है-‘यांत्रिक कारण’। यह यांत्रिक युग है। इस युग में हमारे आस-पास यत्रों की भरमार है। बेतरकीब वस्त्र पहनने से दुर्घटनाएं भी होती हैं। यंत्रो के बीच में ही हमें जीवन यापन करना है। यह हमारी विवषता है। यद्यपि डिजाइन इंजीनियर यत्रों की डिजाइन बनाते समय इस बात का ध्यान रखता है कि उसके उत्पाद से किसी व्यक्ति को कोई नुकसान न पहुंचे। फिर भी यंत्र तो यंत्र ठहरे। उनके पास अपना विवेक तो होता नहीं है। मनुष्य विवेकशील प्राणी है। उसे चाहिए कि अपने विवेक का प्रयोग कर ऐसे वस्त्र पहने जिससे कि वह अपने दैनिक कामों को सरलता पूर्वक अंजाम दे सके। - डॉ० डंडा लखनवी

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    11. यह बात मेकअप के साथ भी यों ही लागू होती है.

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    12. Sahi likha hai Rashmi ji aapne. Hamei jagah aur kaam ke anusar kapde pahanne chahiye. Sharm aur haya to logo ki aakho mei hoti hai kapdo mei nahi. Congratulations on a good post.

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    आपके आने के लिए धन्यवाद
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