मीडिया के ‘‘भूलते भागते क्षण’’

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  • पुष्कर पुष्प
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  • बहुत पुरानी बात नहीं है, जब हमारी दिनचर्या देश दुनिया की ख़बर पढ़ने के साथ शुरू होती थी। सुबह सवेरे अख़बार के बड़े - बड़े और मोटे आकार में लिखे हेडलाइन्स पर चर्चा और उसके नतीजों पर बहस के बाद बाकी के काम होते थे। शाम के समय दफ्तर से लौटने के बाद रेडियो पर प्रसारित होने कार्यक्रम हमें तरोताजा करते थे। इसमें दिन भर की ताजा ख़बरों के बुलेटिन को भी लोग गंभीरता से लेते थे। मीडिया लोगों की जरूरत बन चुकी थी। लोग इस क्षेत्र में क्रांति का इंतजार कर रहे थे। एक ऐसी क्रांति का जिससे ख़बर उनके पास तत्काल पहुंच सकें औरं उन्हें 24 घंटे का इंतजार ना करना पड़े। इंतजार का वक़्त तो धीरे - धीरे ख़त्म होता गया लेकिन जल्दी ही लोगों का इससे मोहभंग होना भी शुरू हो गया। इसमें ज्यादा वक़्त नहीं लगा।

    ये थी ख़बरें आज तक, इंतज़ार कीजिए कल तक। तो लोग इंतजार करते थे। फिर हक़ीकत जैसी, ख़बर वैसी को भी लोगों ने गंभीरता से लिया। फिर चर्चा शुरू हुई बेख़बर ना रहने की और लोग-ख़बरों से जुड़े रहते थे। जुंबा पर सच, दिल में इंडिया-ये है एनडीटीवी इंडिया। ये कुछ ऐसे जुमले थे जो लोगों की जुबान पर चढ़ गए, और मुहावरे के तौर पर इसका इस्तेमाल होने लगा। पूरालेख मीडिया ख़बर.कॉम पर। यहाँ क्लिक करें।

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